Monday, April 11, 2016
ये है देश का नंबर_वन_एयरपोर्ट - स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट,रायपुर
ये है #देश का #नंबर_वन_एयरपोर्ट, ये बातें इसे बनाती हैं सबसे खास
#स्वामी_विवेकानंद_एयरपोर्ट का एरियल व्यू।
रायपुर. पैसेंजर्स को बेहतर सुविधाएं देने और उन्हें सैटिस्फाइड करने के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) ने रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट को देश का नंबर वन एयरपोर्ट घोषित किया है। एएआई की ओर से नई दिल्ली में आयोजित 21वें वार्षिक समारोह में केंद्रीय विमानन राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार महेश शर्मा ने रायपुर एयरपोर्ट अथॉरिटी के डायरेक्टर संतोष धोके को अवार्ड दिया। 52 एयरपोर्ट्स को पछाड़ा...
- एयरपोर्ट की सुविधाओं और उससे मिलने वाले सेटिस्फेक्शन के असेस्मेंट के लिए हर साल सर्वे किया जाता है।
- कस्टमर सेटिस्फेक्शन सर्वे 2015 में देश भर के 53 एयरपोर्ट्स शामिल हुए। कुल 33 मानकों पर सर्वे कराया गया।
- सर्वे में कुल पांच प्वाइंट्स में से सबसे ज्यादा 4.86 प्वाइंट्स स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट, रायपुर को मिले।
जानिए इस एयरपोर्ट को...
- राजधानी के माना में स्थित स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट नया रायपुर और पुराना रायपुर के लगभग बीचोबीच पड़ता है।
- 2006 में इस एयरपोर्ट में पैसेंजर्स में 82 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी जो देश में उस साल सबसे ज्यादा थी।
- यह देश के उन 35 नॉन-मेट्रो एयरपोर्ट्स में शामिल है जिसे एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने मॉडर्नाइज किया है।
- इस एयरपोर्ट में एयर इंडिया, जेट एयरवेज, इंडिगो आदि की फ्लाइट्स आती-जाती हैं।
लंबा चौड़ा टर्मिनल
- 136 करोड़ की लागत से बना, 18,500 स्क्वायर मीटर एरिया में फैला इंटीग्रेटेड टर्मिनल।
- इसमें दो एयरोब्रिज, 20 चेक-इन काउंटर्स और दो एक्सरे लगेज मशीन्स हैं।
- इसके अलावा तीन चेक-इन प्वाइंट्स और लगेज के लिए तीन कन्वेयर बेल्ट्स भी लगे हैं।
- बिल्डिंग की डिजाइन ऐसी कि एक समय में वहां से 700 पैसेंजर्स, जिनमें 200 विदेश आने-जाने वाले हों, को संभाला जा सकता है।
- टर्मिनल में संभावित इंटरनेशनल फ्लाइट्स को ध्यान में रखते हुए 15 इमिग्रेशन काउंटर्स बनाए गए हैं।
ड्राई एयरपोर्ट
- अपने किशोरावास्था के दो साल रायपुर में बिताने वाले स्वामी विवेकानंद के नाम पर इसका नामकरण हुआ है।
- यह एक 'ड्राई' एयरपोर्ट है। संत के नाम वाली जगह में पब्लिक प्रेशर में बीयर बार नहीं खोला जा सका।
बढ़ रहे पैसेंजर्स
- पिछले साल जारी आंकड़ों के मुताबिक स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट देश के उन टॉप थ्री एयरपोर्ट में शामिल है जहां घरेलू पैसेंजर्स की संख्या 10 लाख या उससे ज्यादा है।
- रायपुर एयरपोर्ट अथॉरिटी का दावा है कि 2016 में नई उड़ानें शुरू होने के बाद रायपुर देश का पहला एयरपोर्ट होगा जहां हर महीने यात्रियों की संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा होगी।
हमर छत्तीसगढ़
#स्वामी_विवेकानंद_एयरपोर्ट का एरियल व्यू।
रायपुर. पैसेंजर्स को बेहतर सुविधाएं देने और उन्हें सैटिस्फाइड करने के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) ने रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट को देश का नंबर वन एयरपोर्ट घोषित किया है। एएआई की ओर से नई दिल्ली में आयोजित 21वें वार्षिक समारोह में केंद्रीय विमानन राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार महेश शर्मा ने रायपुर एयरपोर्ट अथॉरिटी के डायरेक्टर संतोष धोके को अवार्ड दिया। 52 एयरपोर्ट्स को पछाड़ा...
- एयरपोर्ट की सुविधाओं और उससे मिलने वाले सेटिस्फेक्शन के असेस्मेंट के लिए हर साल सर्वे किया जाता है।
- कस्टमर सेटिस्फेक्शन सर्वे 2015 में देश भर के 53 एयरपोर्ट्स शामिल हुए। कुल 33 मानकों पर सर्वे कराया गया।
- सर्वे में कुल पांच प्वाइंट्स में से सबसे ज्यादा 4.86 प्वाइंट्स स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट, रायपुर को मिले।
जानिए इस एयरपोर्ट को...
- राजधानी के माना में स्थित स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट नया रायपुर और पुराना रायपुर के लगभग बीचोबीच पड़ता है।
- 2006 में इस एयरपोर्ट में पैसेंजर्स में 82 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी जो देश में उस साल सबसे ज्यादा थी।
- यह देश के उन 35 नॉन-मेट्रो एयरपोर्ट्स में शामिल है जिसे एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने मॉडर्नाइज किया है।
- इस एयरपोर्ट में एयर इंडिया, जेट एयरवेज, इंडिगो आदि की फ्लाइट्स आती-जाती हैं।
लंबा चौड़ा टर्मिनल
- 136 करोड़ की लागत से बना, 18,500 स्क्वायर मीटर एरिया में फैला इंटीग्रेटेड टर्मिनल।
- इसमें दो एयरोब्रिज, 20 चेक-इन काउंटर्स और दो एक्सरे लगेज मशीन्स हैं।
- इसके अलावा तीन चेक-इन प्वाइंट्स और लगेज के लिए तीन कन्वेयर बेल्ट्स भी लगे हैं।
- बिल्डिंग की डिजाइन ऐसी कि एक समय में वहां से 700 पैसेंजर्स, जिनमें 200 विदेश आने-जाने वाले हों, को संभाला जा सकता है।
- टर्मिनल में संभावित इंटरनेशनल फ्लाइट्स को ध्यान में रखते हुए 15 इमिग्रेशन काउंटर्स बनाए गए हैं।
ड्राई एयरपोर्ट
- अपने किशोरावास्था के दो साल रायपुर में बिताने वाले स्वामी विवेकानंद के नाम पर इसका नामकरण हुआ है।
- यह एक 'ड्राई' एयरपोर्ट है। संत के नाम वाली जगह में पब्लिक प्रेशर में बीयर बार नहीं खोला जा सका।
बढ़ रहे पैसेंजर्स
- पिछले साल जारी आंकड़ों के मुताबिक स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट देश के उन टॉप थ्री एयरपोर्ट में शामिल है जहां घरेलू पैसेंजर्स की संख्या 10 लाख या उससे ज्यादा है।
- रायपुर एयरपोर्ट अथॉरिटी का दावा है कि 2016 में नई उड़ानें शुरू होने के बाद रायपुर देश का पहला एयरपोर्ट होगा जहां हर महीने यात्रियों की संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा होगी।
हमर छत्तीसगढ़
Sunday, April 10, 2016
51 शक्ति पीठ में से एक है रतनपुर का मां महामाया मंदिर
कहते हैं जो भी इस मंदिर की चौखट पर आया वो खाली नहीं गया। जितनी अनोखी इस मंदिर की मान्यता है। उतनी अनोखी इस मंदिर की कहानी है। यहां बैठी मां महामाया देवी के आशीर्वाद से हर संकट दूर हो जाता है। कुंवारी लड़कियों को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। लोगों के सभी कष्ट दूर हो जाते है। देवी मां के इस मंदिर को 51 शक्ति पीठ में एक माना जाता है।
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर से 25 किलोमीटर पर स्थित आदिशक्ति मां महामाया देवी की पवित्र पौराणिक नगरी रतनपुर का इतिहास प्राचीन एवं गौरवशाली है। त्रिपुरी के कलचुरियों की एक शाखा ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक छत्तीसगढ़ में शासन किया। राजा रत्नदेव प्रथम ने मणिपुर नामक गांव को रतनपुर नाम देकर अपनी राजधानी बनाया। श्री आदिशक्ति मां महामाया देवी मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा 11वी शताब्दी में कराया गया था।
मंदिर के निर्माण की है कुई किवदंतिया
1045 ई में राजादेव रत्नदेव प्रथम मणिपुर नामक गांव में रात्रि विश्राम एक वट वृक्ष पर किया। अर्धरात्रि में जब राजा की आंख खुली तब उन्होंने वट वृक्ष के नीचे आलौकिक प्रकाश देखा यह देखकर चमत्कृत हो गए कि वहां आदिशक्ति श्री महामाया देवी की सभा लगी हुई है। इतना देखकर वे अपनी चेतना खो बैठे। सुबह होने पर वे अपनी राजधानी तुम्मान खोल लौट गए और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया। 1050 ई में श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया।
माता सती का गिरा था स्कंध
माना जाता है कि सती की मृत्यु से व्यथित भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भटकते रहे। इस समय माता के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गए। इन्हीं स्थानों को शक्तिपीठ रूप में मान्यता मिली। महामाया मंदिर में माता का दाहिना स्कंध गिरा था। भगवान शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था। इसीलिए इस स्थल को माता के 51 शक्तिपीठों में शामिल किया गया। यहां प्रात:काल से देर रात तक भक्तों की भीड़ लगी रहती है। माना जाता है कि नवरात्र में यहां की गई पूजा निष्फल नहीं जाती है।
नागर शैली में बना है मंदिर का मंडप
नागर शैली में बने मंदिर का मण्डप 16 स्तम्भों पर टिका हुआ है। भव्य गर्भगृह में मां महामाया की साढ़े तीन फीट ऊंची दुर्लभ प्रस्तर प्रतिमा स्थापित है। मान्यताओं के अनुसार मां की प्रतिमा के पृष्ठ भाग में मां सरस्वती की प्रतिमा है जो विलुप्त मानी जाती है।
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर से 25 किलोमीटर पर स्थित आदिशक्ति मां महामाया देवी की पवित्र पौराणिक नगरी रतनपुर का इतिहास प्राचीन एवं गौरवशाली है। त्रिपुरी के कलचुरियों की एक शाखा ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक छत्तीसगढ़ में शासन किया। राजा रत्नदेव प्रथम ने मणिपुर नामक गांव को रतनपुर नाम देकर अपनी राजधानी बनाया। श्री आदिशक्ति मां महामाया देवी मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा 11वी शताब्दी में कराया गया था।
मंदिर के निर्माण की है कुई किवदंतिया
1045 ई में राजादेव रत्नदेव प्रथम मणिपुर नामक गांव में रात्रि विश्राम एक वट वृक्ष पर किया। अर्धरात्रि में जब राजा की आंख खुली तब उन्होंने वट वृक्ष के नीचे आलौकिक प्रकाश देखा यह देखकर चमत्कृत हो गए कि वहां आदिशक्ति श्री महामाया देवी की सभा लगी हुई है। इतना देखकर वे अपनी चेतना खो बैठे। सुबह होने पर वे अपनी राजधानी तुम्मान खोल लौट गए और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया। 1050 ई में श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया।
माता सती का गिरा था स्कंध
माना जाता है कि सती की मृत्यु से व्यथित भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भटकते रहे। इस समय माता के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गए। इन्हीं स्थानों को शक्तिपीठ रूप में मान्यता मिली। महामाया मंदिर में माता का दाहिना स्कंध गिरा था। भगवान शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था। इसीलिए इस स्थल को माता के 51 शक्तिपीठों में शामिल किया गया। यहां प्रात:काल से देर रात तक भक्तों की भीड़ लगी रहती है। माना जाता है कि नवरात्र में यहां की गई पूजा निष्फल नहीं जाती है।
नागर शैली में बना है मंदिर का मंडप
नागर शैली में बने मंदिर का मण्डप 16 स्तम्भों पर टिका हुआ है। भव्य गर्भगृह में मां महामाया की साढ़े तीन फीट ऊंची दुर्लभ प्रस्तर प्रतिमा स्थापित है। मान्यताओं के अनुसार मां की प्रतिमा के पृष्ठ भाग में मां सरस्वती की प्रतिमा है जो विलुप्त मानी जाती है।
Saturday, April 9, 2016
500 साल पुराने इस मंदिर के दर्शन मात्र से पूरी हो जाती है मनोकामना
चैत्र नवरात्रि की शुरूआत शुक्रवार को हुई है। इसि के साथ आस्था का एक नया अध्याय भी शुरू हुआ है। उर्जाधानी में आस्था का केन्द्रबिन्दु सर्वमंगला मंदिर को माना जाता है। मंदिर के बारे में एक ऐसी खास बात है। जिससे ढ़ेरो लोग अब भी अनभिज्ञ हैं।
सर्वमंगला मंदिर का इतिहास वैसे तो 118 साल पुराना है। जिसकी स्थापना सन् 1898 के आस पास मानी जाती है। लेकिन इससे भी सालों पुरानी यहां एक और चीज है।
वो है सूर्य देव के मनमोहक प्रतिमा के समीप स्थित वट वृक्ष, मंदिर के पुजारी अनिल पाण्डेय की मानें तो यह वट वृक्ष लगभग 500 वर्ष पुराना है। जैसा कि उनके पूर्वजों ने उन्हें बताया है।
इस वृक्ष की सबसे बड़ी खासियत है कि इसे मानोकामना पूरा करने वाला वृक्ष माना जाता है। पूर्व में इस वृक्ष के नीचे हाथी भी आकर विश्राम किया करते थे। इसके बाद पिछले कुछ वर्षों तक विशाल वट वृक्ष के झूले जैसे तनों पर मयूर भी आकर विश्राम व क्रीडा करते थे।
ऐसी मान्यता है कि इस वृक्ष की टहनियों में रक्षा सूत्र बांधकर मन्नत मांगने पर मनोकामना पूरी हो जाती है। यह मान्यता पिछले कई वर्षों से चली आ रही है। इस 500 साल पुराने वट वृक्ष की टहनियों से लेकर तने तक रक्षा सूत्र से बंधे हुए हैं। खासतौर से महिलाएं यहां बड़ी तादात में रक्षा सूत्र बांधकर मन्नता मांगती है। इस वर्ष मंदिर में 900 मनोकामना दीप कलश भी जागमगाएंगे।
सर्वमंगला मंदिर का इतिहास वैसे तो 118 साल पुराना है। जिसकी स्थापना सन् 1898 के आस पास मानी जाती है। लेकिन इससे भी सालों पुरानी यहां एक और चीज है।
वो है सूर्य देव के मनमोहक प्रतिमा के समीप स्थित वट वृक्ष, मंदिर के पुजारी अनिल पाण्डेय की मानें तो यह वट वृक्ष लगभग 500 वर्ष पुराना है। जैसा कि उनके पूर्वजों ने उन्हें बताया है।
इस वृक्ष की सबसे बड़ी खासियत है कि इसे मानोकामना पूरा करने वाला वृक्ष माना जाता है। पूर्व में इस वृक्ष के नीचे हाथी भी आकर विश्राम किया करते थे। इसके बाद पिछले कुछ वर्षों तक विशाल वट वृक्ष के झूले जैसे तनों पर मयूर भी आकर विश्राम व क्रीडा करते थे।
ऐसी मान्यता है कि इस वृक्ष की टहनियों में रक्षा सूत्र बांधकर मन्नत मांगने पर मनोकामना पूरी हो जाती है। यह मान्यता पिछले कई वर्षों से चली आ रही है। इस 500 साल पुराने वट वृक्ष की टहनियों से लेकर तने तक रक्षा सूत्र से बंधे हुए हैं। खासतौर से महिलाएं यहां बड़ी तादात में रक्षा सूत्र बांधकर मन्नता मांगती है। इस वर्ष मंदिर में 900 मनोकामना दीप कलश भी जागमगाएंगे।
Friday, April 8, 2016
136 साल से सागौन के 24 स्तंभों पर खड़ा है मां दंतेश्वरी का मंदिर
जगदलपुर शहर के आस्था का प्रमुख केन्द्र दंतेश्वरी मंदिर में मां के दर्शन के लिए आप कई बार गए होंगे, लेकिन क्या आपने दंतेश्वरी मंदिर में खड़े 24 स्तंभों को गौर से देखा है।
सीमेंट या चूना पत्थर की तरह दिखने वाले ये स्तंभ दरअसल लकड़ी के हैं, जिस परओडिशा के कलाकारों ने आकर्षक नक्काशी की है। मंदिर में दंतेश्वरी माता की मूर्ति संगमरमर से निर्मित सिंहवाहिनी है। यहां लकड़ी से निर्मित भगवान विष्णु की प्रतिभा भी विराजमान है।
वारंगल के राजाओं ने 1880 में करवाया था निर्माण
शहर के दंतेश्वरी मंदिर को वारंगल के राजा हीराला चितेर ने 1880 में बनवाया था। उस समय इस इलाके में उनका राजपाठ था। वारंगल के राजाओं की कुलदेवी मां दंतेश्वरी थी और वे विष्णु भक्त भी थे। इससे पहले बस्तर में नागवंशी राजाओं का शासन रहा। पंडित राम चंद्र रथ ने बताया कि पहले बस्तर की ईस्ट देवी मावली माता थी। इसी वजह से दशहरे के समय मावली परघाव किया जाता है।
1958 में स्थापित हुई मां सरस्वती की प्रतिमा
दंतेश्वरी मंदिर में मां सरस्वती की प्रतिभा भी स्थापित है। इसकी स्थापना 1958 में महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने करवाई थी। गौरतलब है कि महाराज भंजदेव की कुलदेवी काली माता थी।
प्रवेश द्वार में विष्णु के दस अवतार
दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य द्वार स्थित दरवाजे में विष्णु भगवान के 10 अवतारों का वर्णन किया गया है और उसके ऊपर गरूड़ का चित्र बना हुआ है।
पंडित कृष्ण कुमार पाढ़ी ने बताया कि यह मंदिर पहले लकडि़यों से बना था, बाद में इसका पुनरुद्धार कर टाइल्स आदि लगाए गए। मंदिर में माता की जो अन्य मूर्ति स्थापित की गई है वह अष्ट धातु की है। शारदीय नवरात्रि में माता का मुख दक्षिण दिशा की ओर व चैत्र नवरात्रि में पूर्व में रखकर पूजा की जाती है।
सीमेंट या चूना पत्थर की तरह दिखने वाले ये स्तंभ दरअसल लकड़ी के हैं, जिस परओडिशा के कलाकारों ने आकर्षक नक्काशी की है। मंदिर में दंतेश्वरी माता की मूर्ति संगमरमर से निर्मित सिंहवाहिनी है। यहां लकड़ी से निर्मित भगवान विष्णु की प्रतिभा भी विराजमान है।
वारंगल के राजाओं ने 1880 में करवाया था निर्माण
शहर के दंतेश्वरी मंदिर को वारंगल के राजा हीराला चितेर ने 1880 में बनवाया था। उस समय इस इलाके में उनका राजपाठ था। वारंगल के राजाओं की कुलदेवी मां दंतेश्वरी थी और वे विष्णु भक्त भी थे। इससे पहले बस्तर में नागवंशी राजाओं का शासन रहा। पंडित राम चंद्र रथ ने बताया कि पहले बस्तर की ईस्ट देवी मावली माता थी। इसी वजह से दशहरे के समय मावली परघाव किया जाता है।
1958 में स्थापित हुई मां सरस्वती की प्रतिमा
दंतेश्वरी मंदिर में मां सरस्वती की प्रतिभा भी स्थापित है। इसकी स्थापना 1958 में महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने करवाई थी। गौरतलब है कि महाराज भंजदेव की कुलदेवी काली माता थी।
प्रवेश द्वार में विष्णु के दस अवतार
दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य द्वार स्थित दरवाजे में विष्णु भगवान के 10 अवतारों का वर्णन किया गया है और उसके ऊपर गरूड़ का चित्र बना हुआ है।
पंडित कृष्ण कुमार पाढ़ी ने बताया कि यह मंदिर पहले लकडि़यों से बना था, बाद में इसका पुनरुद्धार कर टाइल्स आदि लगाए गए। मंदिर में माता की जो अन्य मूर्ति स्थापित की गई है वह अष्ट धातु की है। शारदीय नवरात्रि में माता का मुख दक्षिण दिशा की ओर व चैत्र नवरात्रि में पूर्व में रखकर पूजा की जाती है।
Wednesday, April 6, 2016
सर्वमंगला मंदिर,कोरबा
सर्वमंगला मंदिर
कोरबा शहर से लगा हुआ दुर्गा देवी को समर्पित सर्वमंगला मन्दिर कोरबा के प्रमुख मन्दिरों में से एक है. इसका निर्माण कोरबा के जमींदर राजेश्वर दयाल के पूर्वजों ने कराया था. सर्वमंगला मन्दिर के पास त्रिलोकीनाथ मन्दिर, काली मन्दिर और ज्योति कलश भवन हैं.
पर्यटक इन मन्दिरों के दर्शन भी कर सकते हैं. इन मन्दिरों के पास एक गुफा भी जो नदी के नीचे से होकर गुजरती है. कहा जाता है कि रानी धनराज कुंवर देवी इस गुफा का प्रयोग मन्दिरों तक जाने के लिए किया करती थी.
पर्यटक इन मन्दिरों के दर्शन भी कर सकते हैं. इन मन्दिरों के पास एक गुफा भी जो नदी के नीचे से होकर गुजरती है. कहा जाता है कि रानी धनराज कुंवर देवी इस गुफा का प्रयोग मन्दिरों तक जाने के लिए किया करती थी.
मां चंद्रहासिनी मंदिर,चंद्रपुर,रायगढ़
सती के अंग जहां-जहां धरती पर गिरे थे,वहां मां दुर्गा के शक्तिपीठ माने जाते हैं।महानदी व माण्ड नदी के बीच
बसे चंद्रपुर में मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक स्वरूप मां चंद्रहासिनी के रूप में विराजित है।
चंद्रमा की आकृति जैसा मुख होने के कारण इसकी प्रसिद्धि चंद्रहासिनी और चंद्रसेनी मां के नाम जगत में फैल रही है, लेकिन इसका स्वरूप चंद्रमा से भी सुंदर है। माता चंद्रसेनी के दर्शनमात्र से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और मां अपने भक्तों की मनोकामनाएं दो अगरबत्ती व फूल से ही पूर्ण कर देती है।
चंद्रपुर जिला मुख्यालय जांजगीर से 120 किलोमीटर तथा रायगढ़ से 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
यहां माता चंद्रसेनी का वास है। चारों ओर प्राकृतिक सुंदरता से घिरे चंद्रपुर की फिजां बहुत ही मनोरम है। एक ओर जहां महानदी अपने स्वच्छ जल से माता चंद्रसेनी के पांव पखारती है, वहीं दूसरी ओर माण्ड
नदी क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी से कम नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व चंद्रपुर मंदिर पुराने स्वरूप में था, लेकिन जब से ट्रस्ट का गठन हुआ, इसके बाद से मंदिर व परिसर का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मंदिर
का मुख्यद्वार इतना आकर्षक और भव्य है कि यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु उसकी तारीफ किए बगैर
नहीं रूकते। इसके बाद मंदिर परिसर में अर्द्धनारीश्वर, महाबलशाली पवन पुत्र, कृष्ण लीला, चीरहरण, महिषासुर वध, चारों धाम, नवग्रह की मूर्तियां, सर्वधर्म सभा, शेष शै्यया तथा अन्य देवी-देवताओं की भव्य
मूर्तियां जीवन्त लगती हैं।
इसके अलावा मंदिर परिसर में ही स्थित चलित झांकी महाभारत काल का सजीव चित्रण है, जिसे देखकर महाभारत के चरित्र और कथा की विस्तार से जानकारी भी मिलती है। दूसरी ओर भूमि के अंदर बनी सुरंग
रहस्यमयी लगती है और इसका भ्रमण करने पर रोमांच महसूस होता है।
वहीं माता चंद्रसेनी की चंद्रमा आकार प्रतिमा के एक दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण
होती हैं। चंद्रहासिनी माता का मुख मंडल चांदी से चमकता है, ऐसा नजारा देश भर के अन्य मंदिरों में दुर्लभ है। चंद्रहासिनी मंदिर के कुछ दूर आगे महानदी के बीच मां नाथलदाई का मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि मां चंद्रहासिनी के दर्शन के बाद माता नाथलदाई के दर्शन भी जरूरी है। अन्यथा माता नाराज हो जाती है। यह भी कहा जाता है कि महानदी में बरसात के दौरान लबालब पानी भरे होने के बाद भी मां नाथलदाई का मंदिर नहीं डूबता। एक किंवदंति के अनुसार हजारों वर्षो पूर्व सरगुजा की भूमि को छोड़कर माता चंद्रसेनी देवी उदयपुर और रायगढ़ होते हुए चंद्रपुर में महानदी के तट पर आती हैं। महानदी की पवित्र शीतल धारा से प्रभावित होकर यहां पर वह विश्राम करने लगती हैं। वर्षों व्यतीत हो जाने पर भी उनकी नींद नहीं खुलती। एक बार संबलपुर के
राजा की सवारी यहां से गुजरती है, तभी अनजाने में चंद्रसेनी देवी को उनका पैर लग जाता है और माता की नींद खुल जाती है। फिर स्वप्न में देवी उन्हें यहां मंदिर निर्माण और मूर्ति स्थापना का निर्देश देती हैं। संबलपुर के राजा चंद्रहास द्वारा मंदिर निर्माण और देवी स्थापना का उल्लेख मिलता है। देवी की आकृति चंद्रहास जैसे होने के कारण उन्हें ‘‘चंद्रहासिनी देवी’’ भी कहा जाता है। राजपरिवार ने मंदिर की व्यवस्था का भार यहां के जमींदार
को सौंप दिया। यहां के जमींदार ने उन्हें अपनी कुलदेवी स्वीकार करके पूजा अर्चना की। इसके बाद से माता चंद्रहासिनी की आराधना जारी है। यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। वहीं वर्ष के दोनों नवरात्रि पर्वो पर मेले जैसा माहौल रहता है। छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों के श्रद्धालु यहां नवरात्रि में ज्योति कलश प्रज्जवलित कराकर मां से अपने सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। कई श्रद्धालु मनोकामना पूरी करने के लिए यहां बकरे व मुर्गी की बलि देते हैं।
कैसे पहुंचे चंद्रपुर
चंद्रपुर पहुंचने के लिए श्रद्धालु रेलमार्ग से रायगढ़
या खरसिया स्टेशन में उतरकर बस व अन्य वाहनों से माता के दरबार
पहुंच सकते हैं। इसके अलावा जांजगीर, चांपा,
सक्ती, सारंगढ़, डभरा से चंद्रपुर जाने के लिए दिन भर
बस व जीप आदि की सुविधा हैै।
यात्री यदि चाहे तो चांपा या रायगढ़ से प्राइवेट वाहन किराए
पर लेकर भी चंद्रपुर पहुंच सकते हैं।
बसे चंद्रपुर में मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक स्वरूप मां चंद्रहासिनी के रूप में विराजित है।
चंद्रमा की आकृति जैसा मुख होने के कारण इसकी प्रसिद्धि चंद्रहासिनी और चंद्रसेनी मां के नाम जगत में फैल रही है, लेकिन इसका स्वरूप चंद्रमा से भी सुंदर है। माता चंद्रसेनी के दर्शनमात्र से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और मां अपने भक्तों की मनोकामनाएं दो अगरबत्ती व फूल से ही पूर्ण कर देती है।
चंद्रपुर जिला मुख्यालय जांजगीर से 120 किलोमीटर तथा रायगढ़ से 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
यहां माता चंद्रसेनी का वास है। चारों ओर प्राकृतिक सुंदरता से घिरे चंद्रपुर की फिजां बहुत ही मनोरम है। एक ओर जहां महानदी अपने स्वच्छ जल से माता चंद्रसेनी के पांव पखारती है, वहीं दूसरी ओर माण्ड
नदी क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी से कम नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व चंद्रपुर मंदिर पुराने स्वरूप में था, लेकिन जब से ट्रस्ट का गठन हुआ, इसके बाद से मंदिर व परिसर का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मंदिर
का मुख्यद्वार इतना आकर्षक और भव्य है कि यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु उसकी तारीफ किए बगैर
नहीं रूकते। इसके बाद मंदिर परिसर में अर्द्धनारीश्वर, महाबलशाली पवन पुत्र, कृष्ण लीला, चीरहरण, महिषासुर वध, चारों धाम, नवग्रह की मूर्तियां, सर्वधर्म सभा, शेष शै्यया तथा अन्य देवी-देवताओं की भव्य
मूर्तियां जीवन्त लगती हैं।
इसके अलावा मंदिर परिसर में ही स्थित चलित झांकी महाभारत काल का सजीव चित्रण है, जिसे देखकर महाभारत के चरित्र और कथा की विस्तार से जानकारी भी मिलती है। दूसरी ओर भूमि के अंदर बनी सुरंग
रहस्यमयी लगती है और इसका भ्रमण करने पर रोमांच महसूस होता है।
वहीं माता चंद्रसेनी की चंद्रमा आकार प्रतिमा के एक दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण
होती हैं। चंद्रहासिनी माता का मुख मंडल चांदी से चमकता है, ऐसा नजारा देश भर के अन्य मंदिरों में दुर्लभ है। चंद्रहासिनी मंदिर के कुछ दूर आगे महानदी के बीच मां नाथलदाई का मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि मां चंद्रहासिनी के दर्शन के बाद माता नाथलदाई के दर्शन भी जरूरी है। अन्यथा माता नाराज हो जाती है। यह भी कहा जाता है कि महानदी में बरसात के दौरान लबालब पानी भरे होने के बाद भी मां नाथलदाई का मंदिर नहीं डूबता। एक किंवदंति के अनुसार हजारों वर्षो पूर्व सरगुजा की भूमि को छोड़कर माता चंद्रसेनी देवी उदयपुर और रायगढ़ होते हुए चंद्रपुर में महानदी के तट पर आती हैं। महानदी की पवित्र शीतल धारा से प्रभावित होकर यहां पर वह विश्राम करने लगती हैं। वर्षों व्यतीत हो जाने पर भी उनकी नींद नहीं खुलती। एक बार संबलपुर के
राजा की सवारी यहां से गुजरती है, तभी अनजाने में चंद्रसेनी देवी को उनका पैर लग जाता है और माता की नींद खुल जाती है। फिर स्वप्न में देवी उन्हें यहां मंदिर निर्माण और मूर्ति स्थापना का निर्देश देती हैं। संबलपुर के राजा चंद्रहास द्वारा मंदिर निर्माण और देवी स्थापना का उल्लेख मिलता है। देवी की आकृति चंद्रहास जैसे होने के कारण उन्हें ‘‘चंद्रहासिनी देवी’’ भी कहा जाता है। राजपरिवार ने मंदिर की व्यवस्था का भार यहां के जमींदार
को सौंप दिया। यहां के जमींदार ने उन्हें अपनी कुलदेवी स्वीकार करके पूजा अर्चना की। इसके बाद से माता चंद्रहासिनी की आराधना जारी है। यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। वहीं वर्ष के दोनों नवरात्रि पर्वो पर मेले जैसा माहौल रहता है। छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों के श्रद्धालु यहां नवरात्रि में ज्योति कलश प्रज्जवलित कराकर मां से अपने सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। कई श्रद्धालु मनोकामना पूरी करने के लिए यहां बकरे व मुर्गी की बलि देते हैं।
कैसे पहुंचे चंद्रपुर
चंद्रपुर पहुंचने के लिए श्रद्धालु रेलमार्ग से रायगढ़
या खरसिया स्टेशन में उतरकर बस व अन्य वाहनों से माता के दरबार
पहुंच सकते हैं। इसके अलावा जांजगीर, चांपा,
सक्ती, सारंगढ़, डभरा से चंद्रपुर जाने के लिए दिन भर
बस व जीप आदि की सुविधा हैै।
यात्री यदि चाहे तो चांपा या रायगढ़ से प्राइवेट वाहन किराए
पर लेकर भी चंद्रपुर पहुंच सकते हैं।
Tuesday, April 5, 2016
शाटन देवी मंदिर,रतनपुर छत्तीसगढ़ - यहाँ बच्चो के अच्छे स्वास्थ्य लिए देवी को चढ़ाते है लौकी
शाटन देवी मंदिर, छत्तीसगढ़ - यहाँ बच्चो के अच्छे स्वास्थ्य लिए देवी को चढ़ाते है लौकी
छत्तीसगढ़ के रतनपुर में स्थित शाटन देवी मंदिर(बच्चों का मंदिर) से एक अनोखी परंपरा जुड़ी है। मंदिरों में आमतौर पर फूल, प्रसाद, नारियल आदि भगवान को चढ़ाने का विधान है, लेकिन शाटन देवी मंदिर में देवी को लौकी और तेंदू की लकड़ियां चढ़ाई जाती हैं। इस मंदिर को बच्चों का मंदिर भी कहते हैं। श्रद्धालु यहां अपने बच्चों की तंदुरुस्ती के लिए प्रार्थना करते हैं और माता को लौकी और तेंदू की लकड़ी अर्पण करते हैं। इस मंदिर में यह परंपरा कैसे शुरू हुई यह कोई नहीं जानता, लेकिन ऐसी मान्यता है कि जो भी यहां लौकी और तेंदू की लकड़ी चढ़ाता है, उनकी मनोकामना पूरी होती है।
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