कुटुमसर की गुफा - छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की इस गुफा में आदि काल के मानवों का निवास था। कहा जाता है कि यहां प्रागैतिहासिक काल के मानव रहा करते थे। वैज्ञानिकों के अनुसार करोड़ों वर्ष पहले यह क्षेत्र पानी में डूबा हुआ था। पानी के बहाव से ही यहां गुफाओं का निर्माण हुआ। कुटुमसर की गुफा में गहरा अंधेरा है इसका आकार सर्पीला है विश्व की सबसे अधिक लंबी गुफाओं में इसे दूसरे नंबर पर आंका गया है। अंदर पानी के छोटे तालाब भी हैं।
प्रगैतिहासिक काल में कुटुमसर की गुफाओं में मनुष्य रहा करते थे। फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद, इंस्टीटयूट आफ पेलको बॉटनी लखनऊ तथा भूगंर्भ अध्ययन शाला लखनऊ के सम्मिलित शोध से यह बात सामने आई है। विश्व प्रसिध्द बस्तर की कुटुमसर की गुफाएं कई रहस्यों को अभी भी अपने में समेटे हुए है जिनका भूगर्भ शास्त्रियों द्वारा लगातार अध्ययन किया जा रहा है। भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि करोड़ों वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में कुटुमसर की गुफाऐं स्थित है वह क्षेत्र पूरा पानी में डूबा हुआ था। गुफाओं का निर्माण प्राकृतिक परिवर्तनों साथ-साथ पानी के बहाव के कारण हुआ। कुटुमसर की गुफाऐं जमीन से 55 फुट नीचे है। इनकी लंबाई 330 मीटर है। इस गुफा के भीतर कई पूर्ण विकसित कक्ष है जो 20 से 70 मीटर तक चौड़े है। फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद के शोधकर्ताओं ने इन्हीं कक्षों के अध्ययन के बाद निष्कर्ष पर पहुंचे है कि करोड़ों वर्ष पूर्व यहां के आस पास के लोग इन गुफाओं में रहा करते थे। संभवत: यह प्रगैतिहासिक काल था। चूना पत्थर से बनी कुटुमसर की गुफाओं के आंतरिक और बाह्य रचना के अध्ययन के उपरांत भूगर्भशास्त्री कई निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। उदाहरण के लिये चूना पत्थर के रिसाव कार्बनडाईक्साइउ तथा पानी की रासायनिक क्रिया से सतह से लेकर छत तक अद्भूत प्राकृतिक संरचनायें गुफा के अंदर बन चुकी हैं।
तीरथगढ़ से 10 किलोमीटर की दूरी पर विश्व प्रसिद्ध कोटमसर की प्राकृति गुफाएं स्थित है। विष्व की सबसे लम्बी इस गुफा की लंबाई 4500 मीटर है। चूना पत्थर के घुलने से बनी ये गुफाएं चूनापत्थर के जमने से बनी संरचनाओं के कारण प्रसिद्ध है। चूनापत्थर के जमाव के कारण स्टलेगटाईट, स्टलेगमाईट एवं ड्रिपस्टोन जैसी संरचनायें बन जाती हैं। छत पर लटकते झूमर स्टलेग्टाईट, जमीन से ऊपर जाते स्तंभ स्टलेगमाईट एवं छत एवं जमीन से मिले बड़े-बड़े स्तंभ ड्रिप स्टोन कहलाते हैं। डॉ.शंकर तिवारी ने प्रथम बार इस गुफा का वर्णन किया था। इस गुफा में छोटे-छोटे पोखर स्थित हैं जिनमें पायी जाने वाली छोटी-छोटी मछलियों की आखें नहीं पायी जातीं वेज्ञानिकों का मानना है कि सदियों से अंधेरे में रहने के कारण इनकी आखों की उपयोगिता खत्म हो गई एवं अब ये जन्म से ही अंधी पैदा होती हैं जोकि डार्विन के सिद्धांत की पुष्टी करती है
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